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"तब और अब" (श्रीमती रजनी माहर)

Tuesday, 26 January 2010

(श्रीमती रजनी माहर)

तब

रुपये किलो था

आटा,
अब है

कितना घाटा,
नानी संग

जाती बाजार,
नौ रुपये किलो था
अनार,
एक रुपये में

दो किलो ज्वार,
गेहूँ चावल की भरमार,
कम मिलती थी बहुत पगार,
कभी न होते थे बीमार,
तन चुस्त थे
मन दुरुस्त थे,
थोड़े में
सब लोग मस्त थे,
दूध-दही

सब कुछ था
शुद्ध
वातावरण

प्रदूषण-मुक्त
IMG_0618
अब

टमाटर

गुस्से से लाल हैं
जेबें

खस्ता हाल हैं,
गरीब का थाली में-
दाल है ना भात है,
नकली सामान की-
भरमार है,
मिठाई से
मिठास गायब है,
लाली से
पुते हुए लब हैं,
मँहगाई की
चौतरफा मार है,
पीजिए हुजूर!
यूरिया के दूध वाली-
चाय तैयार है!!

(श्रीमती रजनी माहर)

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"चापलूसी की अदा हमे आती नही" (रजनी माहर)

Friday, 15 January 2010

चापलूसी की अदा हमे आती नही.
धोखे हम ने किसी को दिए ही नही.
आईना पर परदा डालने की
अदा हमे आती नही.
उनको जो आयना दिखलाया हमने
देख अस्क अपना
नफ़रत करने हमसे लगे
झूठ पर परदा डालने की
अदा हमें आती नही.
सच जो उनसे कहा हमने
नफ़रत करने हमसे लगे
पाप करने की अदा हमें आती नही.
पुण्य के रास्ते की जो बात की
नफ़रत करने वो हमसे लगे.
बनावट की अदा हमं आती नही
बग़ावत की राह हमें भाती नही .
आँख उनकी खुली व्यथित हो गये बस
नफ़रत हमसे वो करने लगे.
हिंसा की अदा हमें आती नही
जीव हत्या की राह हमें भाती नही
गाँधी बाबा के वचनो की जो बात की
नफ़रत बस हमसे वो करने लगे.
आत्मसम्मान उनका है प्यारा हमें .
चाह स्वाभिमान अपना भी कायम रहे.
सबका सम्मान करने की जो बात की
बस नफ़रत हमसे वो करने लगे

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"मंगलमय नव-वर्ष 2010"

Thursday, 31 December 2009

नव-वर्ष 2010 आप सबको मंगलमय हो!
डॉ.इन्द्र देव माहर,
श्रीमती रजनी माहर
नन्दिनी एवं पल्लवी

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"!! मुक्तक !!" (डॉ.इन्द्र देव माहर)

Saturday, 31 October 2009


!! मुक्तक !!

जीवन के झंझावातों में,
अब तक इतना उलझा था मैं,
प्रीत-रीत मर्यादाओं के,
बन्धन ने इतना घेरा था!
जीवन के पग-पग पर मैंने,
सारे जग को अपना जाना,
आँख खुली तो बोध हुआ,
दुनिया मे सब तेरा-मेरा था!!

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दृष्टिकोण (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)

Sunday, 15 March 2009

भूल चुके हैं आज सब,


ऊँचे दृष्टिकोण,


दृष्टि तो अब खो गयी,


शेष रह गया कोण।


शेष रह गया कोण,


स्वार्थ में सब हैं अन्धे,


सब रखते यह चाह,


मात्र ऊँचे हो धन्घे।


कह मयंक उपवन में,


सिर्फ बबूल उगे हैं,


सभी पुरातन आदर्शो को,


भूल चुके हैं।

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मेरी गुड़िया (श्रीमती रजनी माहर)

Tuesday, 10 March 2009

मेरी गुड़िया जब से,


मेरे जीवन में आयी हो।


सूने घर आँगन में मेरे,


नया सवेरा लायी हो।


पतझड़ में बन कर बहार,


मेरे उपवन में आयी हो।


गुजर चुके बचपन को मेरे,


फिर से ले आायी हो।


सुप्त हुई सब इच्छाओ को,


तुमने पुनः जगाया।


पानी को मम कहना,


मुझको तुमने ही सिखलाया।


तुमने किट्टू को तित्तू ,


तुतली जबान से बतलाया।


मम्मी को मी पापा को पा,


कह अपना प्यार जताया।


मेरी लाली-पाउडर तुम,


अपने गालों पर मलती हो।


मुझको कितना अच्छा लगता,


जब ठुमके भर कर चलती हो।


सजे-सजाये घर को तुम,


पल भर मे बिखराती हो।


फिर भी गुड़िया रानी तुम,


मम्मी को हर्षाती हो।


छोटी सी भी चोट तुम्हारी,


मुझको बहुत रुलाती है।


तुतली-तुतली बातें तेरी,


मुझको बहुत लुभाती हैं।


दादा जी की ऐनक-डण्डा,


लेकर तुम छिप जाती हो।


फिर भी गुड़िया रानी तुम,


दादा जी को भाती हो।


अपनी भोली बातों से तुम,


सबके दिल पर छायी हो।


मेरी गुड़िया जब से,


मेरे जीवन में आयी हो।


सूने घर आँगन में मेरे,


नया सवेरा लायी हो।

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श्रीमती रजनी के अन्तर्मन के कुछ भावः

Monday, 23 February 2009


जिन्दगी


जिन्दगी धूप ही धूप है,

छाँव का नाम-औ-निशां नही।



जिन्दगी एक पतझड़ है,

बसन्त का नाम-औ-निशां नही।



जिन्दगी सेज है काँटों की,

जहाँ फूलों का नाम-औ-निशां नही।



जिन्दगी आँसुओं का सैलाब है,

यहाँ मुस्कान का नाम-औ-निशां नही।



जिन्दगी निराशा का नाम है,

यहाँ आशा का नाम-औ-निशां नही।



जिन्दगी एक नफरत है,

यहाँ प्यार का नाम-औ-निशां



जिन्दगी एक नदिया है,

जहाँ साहिल का नाम-औ-निशां नही।


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