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"!! मुक्तक !!" (डॉ.इन्द्र देव माहर)

Saturday, 31 October 2009


!! मुक्तक !!

जीवन के झंझावातों में,
अब तक इतना उलझा था मैं,
प्रीत-रीत मर्यादाओं के,
बन्धन ने इतना घेरा था!
जीवन के पग-पग पर मैंने,
सारे जग को अपना जाना,
आँख खुली तो बोध हुआ,
दुनिया मे सब तेरा-मेरा था!!

8 comments:

वन्दना 1 November 2009 at 02:47  

waah!adbhut likha hai aur sach likha hai.

गिरिजेश राव 1 November 2009 at 06:45  

सही बात है - तेरा मेरा में ही तो दुनिया चलती है।

RAJNISH PARIHAR 1 November 2009 at 07:21  

ब्लॉग लेखन की दुनिया में आपका स्वागत है!जितना लिखें उससे ज्यादा पढें भी!मेरी शुभकामनायें आपके साथ है..

RAJNISH PARIHAR 1 November 2009 at 07:22  

दो बहिनों की फोटो अच्छी लगी!मेरा आर्शीवाद!!!

Amit K Sagar 1 November 2009 at 08:22  

चिटठा जगत में आपका हार्दिक स्वागत है. लेखन के द्वारा बहुत कुछ सार्थक करें, मेरी शुभकामनाएं.
---
महिलाओं के प्रति हो रही घरेलू हिंसा के खिलाफ [उल्टा तीर] आइये, इस कुरुती का समाधान निकालें!

रचना गौड़ ’भारती’ 1 November 2009 at 21:33  

आपका स्वागत है!मेरी शुभकामनायें आपके साथ है

पदमजा शर्मा 2 November 2009 at 00:55  

डा. इंद्र देव माहर ,चलिए आपकी आँखें खुली तो सही . यह तो जीवन की सच्चाई है .इससे ही पार पाना है .अच्छा लिखा है .

अजय कुमार 2 November 2009 at 22:38  

हिंदी ब्लॉग लेखन के लिए स्वागत और शुभकामनायें
कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें तथा अपने सुन्दर
विचारों से उत्साहवर्धन करें

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