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श्रीमती रजनी के अन्तर्मन के कुछ भावः

Monday, 23 February 2009


जिन्दगी


जिन्दगी धूप ही धूप है,

छाँव का नाम-औ-निशां नही।



जिन्दगी एक पतझड़ है,

बसन्त का नाम-औ-निशां नही।



जिन्दगी सेज है काँटों की,

जहाँ फूलों का नाम-औ-निशां नही।



जिन्दगी आँसुओं का सैलाब है,

यहाँ मुस्कान का नाम-औ-निशां नही।



जिन्दगी निराशा का नाम है,

यहाँ आशा का नाम-औ-निशां नही।



जिन्दगी एक नफरत है,

यहाँ प्यार का नाम-औ-निशां



जिन्दगी एक नदिया है,

जहाँ साहिल का नाम-औ-निशां नही।


4 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 23 February 2009 at 04:03  

आशा और निराशा के क्षण,

कदम-कदम पर मिलते हैं।

काँटो की पहरेदारी में,

ही गुलाब खिलते हैं।

Science Bloggers Association 28 February 2009 at 02:54  

जिन्दगी के कितने ही रूप हैं, देखते जाइए, कविता पढते जाइए।

vandana 28 April 2009 at 06:16  

zindagi ke rang kai re sathi re........apne rang to dikhayegi hi.

डॉ. इन्द्र देव माहर 2 September 2009 at 06:56  

rahi manava dukh ki chinta kyu satati hai dukh to apna sathi hai.

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