"टीचर जी! मत पकड़ो कान" (काव्यानुवाद-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
Monday, 16 January 2012
काव्यानुवाद (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक") टीचर जी! मत पकड़ो कान। सरदी से हो रहा जुकाम।। लिखने की नही मर्जी है। सेवा में यह अर्जी है।। ठण्डक से ठिठुरे हैं हाथ। नहीं दे रहे कुछ भी साथ।। आसमान में छाए बादल। भरा हुआ उनमें शीतल जल।। दया करो हो आप महान। हमको दो छुट्टी का दान।। जल्दी है घर जाने की। गर्म पकोड़ी खाने की।। जब सूरज उग जाएगा। समय सुहाना आयेगा।। तब हम आयेंगे स्कूल। नहीं करेंगे कुछ भी भूल।। |
मूल पाठ (श्रीमती रजनी माहर) mat pakado kan hamare teacher je.... aaj bahut sardi hai.... kaanp rahe hai haath hamare .. likhne kee nahi marji hai...... suraj ko dhak raha hai baadal.. dekho kitana bedardi hai...... daya karo aab choor do hamko .. ghar jane ki jaldi hai...... aab to bas mummi ke hatho khani garam pakaudi hai..... mat pakado kan hamare teacher jee .. aaj bahut sardi hai... |